चैत्र नवरात्र का शुभारंभ सर्वार्थ सिद्धि, अमृत सिद्धि, रवि पुष्य योग में होगी माता की आराधना

0
28

चैत्र नवरात्र शनिवार से प्रारंभ होंगे। इस दौरान 7, 9, 10 अौर 12 अप्रैल को सर्वार्थ सिद्धि योग रहेगा। 13 अप्रैल को अमृत सिद्धि योग अौर 14 अप्रैल को रवि पुष्य योग रहेगा। नवरात्र के दिनों में की गई साधना, सिद्धि, मनोकामना पूर्ण करने के लिए उत्तम है।

ज्योतिषाचार्य पं. विजयभूषण वेदार्थी अौर डॉ. एचसी जैन ने बताया कि घट स्थापना के लिए शनिवार को श्रेष्ठ समय सुबह 7.38 से 9.11 बजे तक रहेगा। अभिजित मुहूर्त सुबह 11.54 से दोपहर 12.42 बजे तक रहेगा, जो घट स्थापना के लिए सर्वश्रेष्ठ रहेगा। नूतन विक्रम संवत्सर का प्रारंभ शनिवार सुबह 6.06 बजे होगा। नवरात्रों में 5 दिन सर्वार्थ सिद्धि योग एवं 1 दिन रवि पुष्य योग रहेगा।

ज्योतिषाचार्य प्रमेंद्र चतुर्वेदी ने बताया कि कलश स्थापना के लिए मिट्‌टी के कुंडे में मिट्टी बिछाएं, इसके बाद उसमें जौ रखें। जौ के ऊपर जल भरकर कलश रखे। कलश पर आम के पत्ते का गुच्छा रखें। कलश में सुपारी, सिक्का, हल्दी, गधं, अक्षत अौर पुष्प डालें।कलश के ऊपर चावल से भरा सकोरा रखें। उसके ऊपर कलावा बांधकर नारियल रखें।

सनातन धर्म मंदिर में होगी सूर्य पूजा व दुर्गासप्तशती का पाठ

नव संवत्सर के पहले दिन सनातन धर्म मंदिर में सूर्य देव की पूजा की जाएगी। मंडल के अध्यक्ष कैलाश चंद्र मित्तल ने बताया कि सनातन धर्म मंडल के पदाधिकारी सुबह 6 बजे सूर्य को अर्घ देंगे। सिंध व्यापार मंडल शनिवार को दालबाजार में शाम 4.30 बजे से प्रसाद का वितरण करेगा। यह जानकारी दिलीप पंजवानी ने दी।

नव संवत्सर पर मराठी समाज गुड़ी पूजन करेगा। मराठी परिवारों द्वारा पूजा की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। गुढ़ी पूजन सूर्योदय के समय होगा। रात में गुड़ी को उतार लिया जाएगा। गुड़ी बनाने में कलश, कड़वे नीम की पत्तियां, पुष्पाहार, शकरगाठी की माला, जरी की साड़ी, ध्वज हेतु लकड़ी की काठी का उपयोग होता है। गुढ़ी पूजन में श्रीफल, सुपारी, हल्दी-कुमकुम का प्रयोग होता है। साथ ही घर के बाहर रंगोली भी बनाई जाती है।

चैत्र नवरात्र शनिवार से प्रारंभ होंगे। इस दौरान 7, 9, 10 अौर 12 अप्रैल को सर्वार्थ सिद्धि योग रहेगा। 13 अप्रैल को अमृत सिद्धि योग अौर 14 अप्रैल को रवि पुष्य योग रहेगा। नवरात्र के दिनों में की गई साधना, सिद्धि, मनोकामना पूर्ण करने के लिए उत्तम है।

ज्योतिषाचार्य पं. विजयभूषण वेदार्थी अौर डॉ. एचसी जैन ने बताया कि घट स्थापना के लिए शनिवार को श्रेष्ठ समय सुबह 7.38 से 9.11 बजे तक रहेगा। अभिजित मुहूर्त सुबह 11.54 से दोपहर 12.42 बजे तक रहेगा, जो घट स्थापना के लिए सर्वश्रेष्ठ रहेगा। नूतन विक्रम संवत्सर का प्रारंभ शनिवार सुबह 6.06 बजे होगा। नवरात्रों में 5 दिन सर्वार्थ सिद्धि योग एवं 1 दिन रवि पुष्य योग रहेगा।

एेसे करें कलश स्थापना

ज्योतिषाचार्य प्रमेंद्र चतुर्वेदी ने बताया कि कलश स्थापना के लिए मिट्‌टी के कुंडे में मिट्टी बिछाएं, इसके बाद उसमें जौ रखें। जौ के ऊपर जल भरकर कलश रखे। कलश पर आम के पत्ते का गुच्छा रखें। कलश में सुपारी, सिक्का, हल्दी, गधं, अक्षत अौर पुष्प डालें।कलश के ऊपर चावल से भरा सकोरा रखें। उसके ऊपर कलावा बांधकर नारियल रखें।

सनातन धर्म मंदिर में होगी सूर्य पूजा व दुर्गासप्तशती का पाठ

नव संवत्सर के पहले दिन सनातन धर्म मंदिर में सूर्य देव की पूजा की जाएगी। मंडल के अध्यक्ष कैलाश चंद्र मित्तल ने बताया कि सनातन धर्म मंडल के पदाधिकारी सुबह 6 बजे सूर्य को अर्घ देंगे। सिंध व्यापार मंडल शनिवार को दालबाजार में शाम 4.30 बजे से प्रसाद का वितरण करेगा। यह जानकारी दिलीप पंजवानी ने दी।

झंग बिरादरी कराएगी देवी भागवत

झंग बिरादरी द्वारा शनिवार से देवी भागवत कराई जाएगी। बिरादरी के अध्यक्ष जगदीश अरोरा ने बताया कि भागवत कथा 14 अप्रैल तक दोपहर 12 बजे से ऊंट पुल के पास स्थित शिव मंदिर पर होगी।

पंचांग पूजन आज: अखिल भारतीय हिंदू महासभा द्वारा नवरात्र के पहले दिन महाराज बाड़े स्थित टाउन हॉल पर पंचांग पूजन, दुर्गा चालीसा का पाठ सुबह 8.52 बजे किया जाएगा। आदि गौड़ ब्राह्मण समाज द्वारा शनिवार शाम 5.30 बजे गायत्री नगर स्थित गायत्री मंदिर में पंचांग पूजन अौर दीप यज्ञ होगा।

सामूहिक रूप से होगा गायत्री मंत्र जाप: गायत्री परिवार द्वारा थाटीपुर स्थित जलेश्वर महादेव मंदिर पर गायत्री मंत्र का सामूहिक जाप अौर हवन किया जाएगा। साधकों द्वारा सुबह 7 से 8 बजे तक गायत्री मंत्र का जाप किया जाएगा।

मांढरे वाली माता के बगल में मां संतोषी व गणेश जी विराजित हैं

शहर के सबसे प्राचीन देवी मंदिरों में से एक मांढरे वाली माता दशकों से शहर ही नहीं सिंधिया राजवंश की आस्था का केंद्र हैं। विजयादशमी पर सिंधिया राजवंश के उत्तराधिकारी आज भी यहां शमी पूजन करने राजसी वेशभूषा में यहां आते हैं। कहा जाता है कि महाराष्ट्र के मांढरे गांव से जयाजीराव सिंधिया के साथ उनकी फौज के लेफ्टिनेंट कर्नल आनंद राव मांढरे भी ग्वालियर आए थे। ले. कर्नल आनंदराव अपने गांव की देवी मांढरे वाली माता की उपासना करते थे उनके वंशज मंदाकिनी मांढरे, अशोक मांढरे ने बताया कि आनंदराव देवी के भक्त थे। माता ने उन्हें सपना देकर ग्वालियर में मूर्ति स्थापना करने को कहा। आनंदराव ने यह बात महाराजा जयाजीराव सिंधिया को बताई। इस मंदिर को बनवाने के लिए जयाजीराव के निर्देश पर ऊंचे टीले को समतल कर मंदिर की स्थापना की गई। मंदिर की देखरेख की जिम्मेदारी महाराजा ने आनंदराव के परिवार को दे दी। सिंधिया परिवार इन्हें कुलदेवी मानकर पूजते हैं। मांढरे वाली माता अष्टभुजा वाली माता है। महिसासुर मर्दिनी के रूप में उनके दर्शन के लिए चैत्र और क्वार में मेला लगता है। इस मंदिर में माता की प्रतिमा के दाईं तरफ मां संतोषी एवं विघ्नविनाशक भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here